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व्यंजन के बाद यदि किसी स्वर या व्यंजन के आने से उस व्यंजन में जो परिवर्तन होता है, वह ‘व्यंजन संधि‘ कहलाता है। ‘व्यंजन संधि’ के कुछ नियम इस प्रकार हैं :
व्यंजन संधि परिभाषा और उदाहरण – Vyanjan Sandhi Examples
हमें एक ऐसी व्यावहारिक व्याकरण की पुस्तक की आवश्यकता महसूस हुई जो विद्यार्थियों को हिंदी भाषा का शुद्ध लिखना, पढ़ना, बोलना एवं व्यवहार करना सिखा सके। ‘हिंदी व्याकरण‘ हमने व्याकरण के सिद्धांतों, नियमों व उपनियमों को व्याख्या के माध्यम से अधिकाधिक स्पष्ट, सरल तथा सुबोधक बनाने का प्रयास किया है।
व्यंजन संधि (Joining of Consonant with a Vowel or a Consonant)
1. वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन क्, च्, ट्, त्, प् के पश्चात् यदि किसी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण (ग, घ, ज, झ, ड, ढ, द, ध, ब, भ) य, र, ल, व, ह या कोई स्वर आ जाए तो वह अपने वर्ग का तीसरावर्ण हो जाता है अर्थात् क्का ग्, च् का ज्, ट्का ड्, त् का द् और पका बहो जाता है; जैसे :
व्यंजन संधि उदाहरण – Vyanjan Sandhi Examples
क् को ग्
| दिक् | + | दर्शन | = | दिग्दर्शन |
| दिक् | + | गज | = | दिग्गज |
| दिक् | + | अंबर | = | दिगंबर |
| वाक् | + | दत्ता | = | वाग्दत्ता |
| दिक् | + | अंत | = | दिगंत |
| वाक् | + | ईश | = | वागीश |
| च् का ज् अच् | + | अंत | = | अजंत |
| ट् का षट् | + | आनन | = | षडानन |
| प्का ब् अप् | + | ज | = | अब्ज |
त् का द्
| जगत् | + | ईश | = | जगदीश |
| तत् | + | अनुसार | = | तदनुसार |
| तत् | + | भव | = | तद्भव |
| उत् | + | घाटन | = | उद्घाटन |
| सत् | + | भावना | = | सद्भावना |
| उत् | + | यम | = | उद्यम |
| भगवत् | + | भक्ति | = | भगवद्भक्ति |
| जगत् | + | अंबा | = | जगदंबा |
| सत् | + | धर्म | = | सद्धर्म |
| सत् | + | वाणी | = | सद्वाणी . |
| भगवत् | + | भजन | = | भगवद्भजन |
| सत् | + | गति | = | सद्गति |
| भगवत् | + | गीता | = | भगवद्गीता |
| उत् | + | धार | = | उद्धार |
| सत् | + | उपयोग | = | सदुपयोग |
2. वर्ग के पहले वर्ण का पाँचवें वर्ण में परिवर्तन
किसी वर्ग के पहले या तीसरे व्यंजन के बाद यदि कोई नासिक्य व्यंजन (ङ्, ज्, ण, न, म्) आ जाता है तो पहले/ तीसरे व्यंजन के स्थान पर अपने ही वर्ग का नासिक्य व्यंजनआ जाता है अर्थात् क्का ङ्, चका ञ्, ट्का ण, त् कान्और प्का म्हो जाता है; जैसे :
| वाक् | + | मय | = | वाङ्मय |
| जगत् | + | नाथ | = | जगन्नाथ |
| सत् | + | मार्ग | = | सन्मार्ग |
| तत् | + | नाम | = | तन्नाम |
| दिक् | + | नाग | = | दिङ्नाग |
| सत् | + | नारी | = | सन्नारी |
| उत् | + | मत्त | = | उन्मत्त |
| षट् | + | मास | = | षण्मास |
| उत् | + | नायक | = | उन्नायक |
| उत् | + | मित्र | = | सन्मित्र |
| चित् | + | मय | = | चिन्मय |
| षट् | + | मुख | = | षण्मुख |
| सत् | + | मति | = | सन्मति |
| तत् | + | मय | = | तन्मय |
| उत् | + | नयन | = | उन्नयन |
| उत् | + | मेष | = | उन्मेष |
| उत् | + | नायक | = | उन्नायक |
| उत् | + | नति | = | उन्नति |
3. ‘त’ संबंधी विशेष नियम
(i) ‘त्’ व्यंजन के बाद च/छ हों तो ‘च’; ज/झ हों तो ज्’; ट/ठ हों तो ‘ट्’; ड/ढ होने पर ‘इ’ और ‘ल’ होने पर ‘ल’ हो जाता है; जैसे :
| उत् | + | लास | = | उल्लास |
| उत् | + | चारण | = | उच्चारण |
| सत् | + | चरित्र | = | सच्चरित्र |
| उत् | + | छिन्न | = | उच्छिन्न |
| उत् | + | चरित | = | उच्चरित |
| सत् | + | चित् | = | सच्चित् |
| सत् | + | जन | = | सज्जन |
| शरत् | + | चंद्र | = | शरदचंद्र |
| जगत् | + | छाया | = | जगच्छाया |
| विपत् | + | जाल | = | विपज्जाल |
| जगत् | + | जननी | = | जगज्जननी |
| वृहत् | + | टीका | = | वृहट्टीका |
| उत् | + | ज्वल | = | उज्ज्वल |
| तत् | + | टीका | = | तट्टीका |
| उत् | + | लेख | = | उल्लेख |
| तत् | + | लीन | = | तल्लीन |
| उत् | + | डयन | = | उड्डयन |
(ii) यदि त् के बाद ‘श’ आए तो त् का’च्’ तथा ‘श’ का ‘छ’ हो जाता है; जैसे :
| उत् | + | श्वास | = | उच्छ्वास |
| तत् | + | शिव | = | तच्छिव |
| सत् | + | शास्त्र | = | सच्छास्त्र |
| उत् | + | शिष्ट | = | उच्छिष्ट |
| तत् | + | शंकर | = | तच्छंकर |
(iii) यदि त् के बाद ‘ह’ व्यंजन आए तो त्’ का ‘द्’ (त् → द्) तथा ‘ह’ का ध (ह → ध)हो जाता है; जैसे :
| उत् | + | हार | = | उद्धार |
| उत् | + | हरण | = | उद्धरण |
| तत् | + | हित | = | तद्धित |
| पद् | + | हति | = | पद्धति |
| उत् | + | हत | = | उद्धत |
4. ‘छ’ संबंधी नियम
यदि किसी स्वर के बाद छ वर्ण आ जाए तो छ से पहले च् वर्ण जुड़ जाता है; जैसे :
| संधि | + | छेद | = | संधिच्छेद |
| स्व | + | छंद | = | स्वच्छंद |
| परि | + | छेद | = | परिच्छेद |
| वि | + | छेद | = | विच्छेद |
| वृक्ष | + | छाया | = | वृक्षच्छाया |
| आ | + | छादन | = | आच्छादन |
| अनु | + | छेद | = | अनुच्छेद |
| लक्ष्मी | + | छाया | = | लक्ष्मीच्छाया |
| छत्र | + | छाया | = | छत्रच्छाया |
5. ‘म’ संबंधी नियम
(i) म् के बाद जिस वर्ग का व्यंजन आता है, अनुस्वार उसी के वर्ग का नासिक्य (ङ्, ब्, ण, न्, म्) अथवा अनुस्वार बन जाता है; जैसे :
| अहम् | + | कार | = | अहंकार |
| सम् | + | कीर्ण | = | संकीर्ण |
| सम् | + | कल्प | = | संकल्प |
| सम् | + | भव | = | संभव |
| सम् | + | गत | = | संगत |
| सम् | + | ताप | = | संताप |
| सम् | + | जय | = | संजय |
| सम् | + | चित | = | संचित |
| सम् | + | पूर्ण | = | संपूर्ण |
| सम् | + | जीवनी | = | संजीवनी |
| सम् | + | भाषण | = | संभाषण |
| हृदयम् | + | गम | = | हृदयंगम |
| किम् | + | कर | = | किंकर |
| किम् | + | चित् | = | किंचित् |
| सम् | + | बंध | = | संबंध |
| परम् | + | तु | = | परंतु |
| सम् | + | ध्या | = | संध्या |
| सम् | + | चय | = | संचय |
| सम् | + | गम | = | संगम |
| किम् | + | तु | = | किंतु |
| सम् | + | तोष | = | संतोष |
| सम् | + | घर्ष | = | संघर्ष |
(ध्यान रखें-शब्द के अंत में अनुस्वार सदैव म्’ का रूप ही लेता है। अतः सम् को हम सं’ भी लिख सकते हैं।)
(ii) ‘म्’ के बाद यदि य, र, ल, व, स, श, ह व्यंजन हों तो ‘म्’ का अनुस्वार हो जाता है; जैसे :
| सम् | + | हार | = | संहार |
| सम् | + | योग | = | संयोग |
| सम् | + | रचना | = | संरचना |
| सम् | + | वर्धन | = | संवर्धन |
| सम् | + | शय | = | संशय |
| सम् | + | वाद | = | संवाद |
| सम् | + | लाप | = | संलाप |
| सम् | + | वत | = | संवत |
| सम् | + | लग्न | = | संलग्न |
| सम् | + | सार | = | संसार |
| सम् | + | शोधन | = | संशोधन |
| सम् | + | यम | = | संयम |
| सं | + | रक्षा | = | संरक्षा |
| सम् | + | रक्षण | = | संरक्षण |
| सम् | + | विधान | = | संविधान |
| सम् | + | रक्षक | = | संरक्षक |
| सम् | + | वहन | = | संवहन |
| सम् | + | युक्त | = | संयुक्त |
| सम् | + | स्मरण | = | संस्मरण |
(iii) म्से परे यदि म वर्ण आए तो म् का द्वित्व हो जाता है; जैसे :
| सम् | + | मान | = | सम्मान |
| सम् | + | मुख | = | सम्मुख |
| सम् | + | मानित | = | सम्मानित |
| सम् | + | मोहन | = | सम्मोहन |
| सम् | + | मिश्रण | = | सम्मिश्रण |
| सम् | + | मिलित | = | सम्मिलित” |
| सम् | + | मति | = | सम्मति |
6. न् का ण यदि ऋ, र तथा ष के बाद ‘न’ व्यंजन आता है, तो उसका ‘ण’ में परिवर्तन हो जाता है। भले ही बीच में क-वर्ग, प-वर्ग, अनुस्वार, य, व, ह आदि में से कोई भी वर्ण क्यों न आ जाए; जैसे :
| परि | + | मान | = | परिमाण |
| भूष् | + | अन | = | भूषण |
| शोष् | + | अन | = | शोषण |
| प्र (पर्) | + | मान | = | प्रमाण |
| तृष् | + | ना | = | तृष्णा |
| परि | + | नाम | = | परिणाम |
| भर | + | न | = | भरण |
| हर | + | न | = | हरण |
| कृष् | + | न | = | कृष्ण |
| ऋ | + | न | = | ऋण |
| विष् | + | नु | = | विष्णु |
| पूर् | + | न | = | पूर्ण |
7. स् का ष यदि ‘स’ व्यंजन से पूर्व अ, आ से भिन्न कोई भी स्वर आ जाता है, तो ‘स’ का परिवर्तन ‘ष’ में हो जाता है; जैसे :
| अभि | + | सेक | = | अभिषेक |
| सु | + | सुप्ति | = | सुषुप्ति |
| नि | + | सेध | = | निषेध |
| अभि | + | सिक्त | = | अभिषिक्त |
| वि | + | सम | = | विषम |
| अनु | + | संगी | = | अनुषंगी |
| नि | + | सिद्ध | = | निषिद्ध |
विशेष- ऊपर के संधियुक्त शब्दों के अतिरिक्त निम्नलिखित फुटकर शब्द उल्लेखनीय हैं :
| उत् | + | स्थान | = | उत्थान |
| सम् | + | कृति | = | संस्कृति |
| अन् | + | आचार | = | अनाचार |
| निर् | + | उद्यम | = | निरुद्यम |
| पुनर् | + | ईक्षण | = | पुनरीक्षण |